असंभव कुछ नहीं।

मैंने सुना है, एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने मित्र के साथ ज्यादा देर तक गपशप में लगा रहा। रात बहुत बीत गयी। चौंककर उठा, उसने कहा बहुत देर हो गयी, अब घर जाऊं।

मित्र ने कहा, आज भाभी तो बहुत इत्र-पान करेंगी। मुल्ला ने कहा तूने मुझे समझा क्या है? अगर घर जाते ही पहला शब्द पत्नी से प्रीतम न निकलवा लूं, तो मेरा नाम बदल देना। या तेरी जिंदगी भर गुलामी कर दूंगा। मित्र भलीभांति मुल्ला की पत्नी को जानता है, उसने कहा कोई फिक्र नहीं, दो मील चलना पड़ेगा–इस अंधेरी रात में–लेकिन मैं आता हूं, शर्त रही!

नसरुद्दीन घर गया। उसने जाकर द्वार पर दस्तक दी और जोर से बोला, “प्रीतम आ गये हैं।’ पत्नी चिल्लायी अंदर से, “प्रीतम जाएं भाड़ में।’ उसने मित्र से कहा, “देखा, कहलवा लिया न! पहला शब्द “प्रीतम” निकलवा लिया न!’

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